
कभी डरती थी मैं दुनिया की बातों से, कभी टूट जाती थी अपनों के आघातों से। राहें कठिन थीं, संघर्षों का दौर था, जीवन जैसे हर पल कोई कठोर प्रश्न था। फिर जीवन में आपके शब्दों का प्रकाश आया, सोई हुई चेतना ने खुद को जगाया। आपने कहा—भागना नहीं, स्वयं को जानो, झूठे सहारों से निकलकर सत्य को पहचानो। आज भी संघर्ष हैं, तूफ़ान भी आते हैं, कुछ लोग शब्दों से भी घाव दे जाते हैं। मगर अब मैं पहले जैसी कमजोर नहीं हूँ, मैं परिस्थितियों के आगे मजबूर नहीं हूँ। आचार्य…




















