
Talking Mirror
रितु जी, आपने बात को बिल्कुल जड़ तक पहुँचा दिया, ठप्पा लगते ही चीज कीमती हो जाती है, यह पकड़ना छोटी बात नहीं है। पर एक जगह ज़रा ठहरिए। आप कह रही हैं प्रकृति और हम एक हैं, यह जानना है। यहीं वही पुराना खिलाड़ी फिर से मैदान में आ गया। जो अभी तक कह रहा था यह मेरा है इसलिए कीमती है, वही अब कह रहा है प्रकृति भी मेरी हो जाए तो मैं उसका ख्याल रखूँगी, उसके लिए दुखी होऊँगी। एकता भी तब्दील होकर एक और अपनापन बन गई, बस दायरा बड़ा हो गया, केंद्र वही रहा। सवा…















