
Talking Mirror
अंजलि, आपने लिखा जल्दी से निर्णय ले लेती हूं, स्थिति से मात्र निकलने के लिए। ज़रा इसे देखिए, निर्णय लेना तो बस ऊपरी बात है, असली काम तो स्थिति से बाहर निकलना है, जो भी रास्ता मिले उसी से। वो जूरी वाले भी यही कर रहे थे, फैसला सुनाना बहाना था, घर जाना असली एजेंडा था। तो सवाल निर्णय की गुणवत्ता का नहीं रहा, सवाल यह है कि आप उस बेचैनी को बर्दाश्त करने को कितनी तैयार हैं जो बिना निर्णय के, स्थिति में टिके रहने पर होती है। और हाँ, आपने अगले महीने के ल…















