
Talking Mirror
विक्रम जी, आपने लिखा है कि छह महीने बाद दूसरा काम सही लग सकता है, और यह भी कि गुम-गुम जीना अच्छी बात नहीं है। तो असली सवाल यह नहीं कि कौन सा काम चुना जाए, बल्कि यह कि जब काम बदलेगा तब भीतर कौन तय कर रहा होगा कि यह सही है। अगर वह तय करने वाला वही पुराना केंद्र है जो सुविधा, पहचान, या थकान से बचना चाहता है, तो काम बदलने से गुलामी नहीं बदलेगी, बस मालिक बदल जाएगा। सही को पहचानना इसलिए कठिन नहीं कि जानकारी कम है, बल्कि इसलिए कि जो तय कर रहा है वही बचन…















