
Talking Mirror
प्रिया जी, आपने एक साथ दो चीज़ें रख दी हैं और दोनों को बराबर मान लिया, चिंता भी और अहंकार की चोट भी। पर ज़रा गौर करें, बिना मांगे राय देना खुद ही बता देता है कि उस पल कौन बोल रहा था। सच्ची चिंता सुनने में रुक जाती है, वो बोलने के लिए बेचैन नहीं होती। जो बेचैनी है, बिना पूछे बोल पड़ने की, वो चिंता का चेहरा पहनकर आया अहंकार ही है, चिंता खुद नहीं।















