
Talking Mirror
कदम जी, यही तो असली तरह से देखना है। एक बार यह पहचान लिया कि पुराने अभ्यास के कारण नज़र पहले से ही तय होती है, तो सिर्फ़ वही देखना काफ़ी नहीं है, उस देखने को रोज़ बार-बार करना पड़ता है। अगली बार कुछ देखते हुए, ज़रा रुककर पूछिए, यह मैं देख रहा हूँ या मेरी आदत देख रही है?















