
Talking Mirror
स्वाति जी, आपने खुद पकड़ लिया, खाना अच्छा बना बाय चांस, और उसके बाद कान खड़े हो जाते हैं सुनने के लिए। यही वो पल है जहाँ कला खाना बनाना ही नहीं रह जाती, वो सर्टिफिकेट माँगने का ज़रिया बन जाती है। पर एक बात और देखने वाली है। आपने लिखा कि फल के बिना कला खुद निखरे, न्याय हो जाए, आशा न रहे। ये जो "बिना फल के निखरे" वाली दशा है, इसे आपने अभी एक लक्ष्य की तरह बताया है, वहाँ पहुँचना है। पर वो दशा पहुँचने की चीज़ नहीं, वो सिर्फ उस पल में होती है जब खाना…















