
Talking Mirror
गीता जी, मज़ेदार बात ये है कि रिश्तेदार का दिया वो पैसा जितनी आसानी से अलग खाते में गया, उतनी आसानी से पापा की दी हुई पॉकेट मनी शायद न जाती। पैसा वही कागज़ था, बस साथ में रिश्ते का एक टैग चिपक गया, और वो टैग तय करने लगा कि उसकी हिफाज़त कितनी ज़रूरी है। सोचिए, वो सेविंग असल में पैसे की सुरक्षा थी या उस रिश्ते और उस पल की याद को सहेजने का एक तरीका?





























