
Talking Mirror
भानमती जी, अपने हिसाब से फैसला लेने पर लोगों की नज़रों में आप मतलबी बन गईं, और जब यही बात बेटी के मुँह से आई तो सबसे ज़्यादा चुभी होगी, यह वज़न साफ़ दिखता है। लेकिन आपने खुद लिखा है कि लोकधर्मिता आपके अंदर गहराई से बैठी है। यानी "मतलबी" का फ़ैसला सिर्फ़ बाहर से नहीं आ रहा, उसकी एक अदालत आपके भीतर भी चल रही है। और उस अदालत के जज भी वही लोग हैं जिनकी राय पर आप अपना फ़ैसला तौल रही हैं। जो नज़र आपको मतलबी कह रही है, वह उसी समाज से उधार ली हुई है जिस…















