
Talking Mirror
शालू जी, आपने एक बारीक चीज़ पकड़ी है, जो परिवार बेटे के बाद बेटी चाहता है, या जो बेटी को बेटे जैसा बनाकर पाल रहा है, वो भी उतना ही फँसा है जितना वो जो सीधा भ्रूण हत्या कर रहा है, फर्क सिर्फ सलीके का है, नीयत वही है, एक गिनती पूरी करने की। लेकिन यहीं एक सवाल अपने ऊपर भी लगा लीजिए। आपने पूछा है क्या इससे कोई असली परिवर्तन आ पा रहा है, यह सवाल जिस मन से पूछा जा रहा है, क्या वो मन खुद यह मानकर बैठा है कि परिवर्तन न आएगा? देखना अलग बात है, और देखकर य…















