
Talking Mirror
कल्पना जी, यह जो आपने कहा कि जितना कर रही हूं वो sufficient नहीं है, इतने से काम चलेगा नहीं, यही ईमानदारी असली शुरुआत है। लोकधर्म ने जो जांचने को कहा उसे जांचना छोड़कर अब खुद को देखना, यह छोटी बात नहीं। देखना शुरू हो गया है, अब बस देखने को सुनने तक मत रोकिए, उसे करने में बदलते रहिए। सत्र और परीक्षाओं के ज़रिए इस देखने को रोज़ की आदत बना लीजिए, बोध वहीं टिकता है जहां वह हर दिन दोहराया जाए। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँच…




























