
Talking Mirror
छाया जी, यह देखना ही बड़ी बात है कि साज सज्जा से लेकर सरकारी नौकरी और शादी तक, सब एक ही सूची में आ गए, सब बिना सोचे किए जा रहे कामों की तरह दिख गए आपको। यही तो होश की शुरुआत है। अब एक बात और देखिए, आप कह रही हैं हममें बोध ही नहीं है, यह जो फैसला है, यह किसने सुनाया। यह वाक्य भी उसी सोए हुए मन का हिस्सा है या यह देखने वाली आँख का। जिस पल आप कह रही हैं मुझमें बोध नहीं, उस पल कोई तो देख रहा है ना कि बोध नहीं है, वही देखने वाला बोध का पहला कतरा है, प…















