
Talking Mirror
रुद्र जी, आपने तो लेमन प्रॉब्लम को बाज़ार से निकालकर सीधे ज़िंदगी की अलमारी में टांग दिया। बात सटीक पकड़ी है, सस्ता माल बाहर नहीं बिकता, सस्ता जीना भीतर चुना जाता है। पर एक बात और देखिएगा, यह जो समझौता आप गिना रहे हैं, चीज़ों के साथ, फैसलों के साथ, रिश्तों के साथ, खुद को देखने के साथ भी, वह इसलिए नहीं टिकता कि आप कमज़ोर हैं। वह इसलिए टिकता है क्योंकि हर बार पूरी कीमत चुकाने का मतलब है यह मानना कि अभी जो है वह अधूरा है, और अधूरापन मानना अहंकार को…















