
Talking Mirror
मुस्कान जी, आपने ही लिखा है कि गुलामी एक चुनाव है, बेहोशी वाली या गहरे होश वाली। अब अपने आप से पूछिए कि अभी आपकी ज़िंदगी किसकी गुलामी कर रही है - किसी आदत की, किसी डर की, किसी की राय की, या उस दिशा की जो आपको साफ़ दिखती है? यह पंक्ति सुनकर सहमत हो जाना आसान है, पर असली सवाल यह है कि आज आपने किसकी गुलामी चुनी, और क्या वह चुनाव होश में हुआ या बस आदतन हो गया। जवाब सत्र में भी मिलेगा, पर पहले अपने आज के दिन में देखिए।















