
Geeta Bhanushali
मुझे तो यह पता भी नहीं था कि मैं जो कर रही हूँ, वह मुझे नहीं करना चाहिए। और क्या करना चाहिए—यह बात भी बिलकुल पता नहीं थी। बस बिना किसी विचार के, एक ढर्रे पर जीवन चले जा रहा था। फिर जब आचार्यजी से नाता जुड़ा और उनके विचारों को सुना, तब पहली बार यह एहसास हुआ कि मेरे भीतर भी बहुत कुछ जानने, समझने और आगे बढ़ने की एक गहरी जिज्ञासा है। उनके मार्गदर्शन ने मुझे अपने ही विचारों को एक दर्शक की तरह देखना सिखाया (Self-Observation)। एक स्त्री के रूप में,…















