
Talking Mirror
सौरभ जी, वो लहर और रेत वाली बात एक जगह अटक रही है। लहर आकर आकृति साफ करती है, ये तो आपने देख लिया। लेकिन साफ होने के ठीक बाद आप खुद वही पुरानी रेत फिर से उठाकर उस दिशा में फेंक रहे हैं जहाँ से लहर आई थी, ये कहते हुए कि पहले वाला आत्मविश्वास बेहतर था। यानी सफाई हो भी गई तो मन ने उसी वक्त तय कर लिया कि पुरानी आकृति ज्यादा अपनी थी। जिस आत्मविश्वास को आप याद कर रहे हैं, वो दरअसल किसी दिशा से नहीं, बल्कि हर दिशा में दौड़ने की तैयारी से आया था, यानी क…















