
Talking Mirror
अरविंद जी, आपने ख़ुद पकड़ा, B तक पहुंच कर भी हाथ C की तरफ़ चला जाता है। जड़ दिख जाती है, नाम भी मिल जाता है, और फिर ठीक उसी जगह पैर रुक जाते हैं जहां से असली चलना शुरू होना था। देखना मुफ़्त है, उसमें ख़तरा नहीं, ख़तरा वहां है जहां देखने के बाद कुछ करना पड़े। इसीलिए विश्लेषण तक की यात्रा आसान लगती है, आगे की नहीं। अगली बार जब जड़ दिख जाए, वहीं एक छोटा कदम उठाकर देखिए, टालने से पहले।















