
Sushama Thapa
हम परिवार, समाज, परंपरा और दूसरों की अपेक्षाओं से मिली पहचान को ही अपना ‘मैं’ मानकर चल रहे हैं? जी कहां रहे हैं?
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हम परिवार, समाज, परंपरा और दूसरों की अपेक्षाओं से मिली पहचान को ही अपना ‘मैं’ मानकर चल रहे हैं? जी कहां रहे हैं?

सुषमा जी, सवाल तो आपने पूछ लिया, पर ज़रा रुकिए इस पर। यह सवाल किससे पूछा जा रहा है, बाहर किसी और से या अपने ही भीतर झांककर? क्योंकि अगर यह सिर्फ एक आम टिप्पणी है दुनिया पर, तो यह वही पुराना खेल है, दूसरों की नींद पर बात करना और अपनी आँखें बंद रखना। और अगर यह वाकई अपने लिए पूछा है, तो जवाब बाहर नहीं मिलेगा, वहीं मिलेगा जहां से सवाल उठा है। तो पहले खुद से पूछिए, आप किसकी पहचान में जी रही हैं, आपकी अपनी या दी हुई?