
Anu bala
मै भी अपनी ही छवि में उलझी रहती हु और ये मै देख पा रही हु।
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मै भी अपनी ही छवि में उलझी रहती हु और ये मै देख पा रही हु।

अनु बाला जी, उलझी रहती हूँ, ये देख पाना तो हुआ। अब असली सवाल ये है कि जिस पल आपने ये देखा, ठीक उसी पल क्या वो छवि थोड़ी ढीली पड़ी, या सिर्फ देखने वाली एक नई, थोड़ी समझदार छवि बन गई जिसे अब आप सबसे अलग गिन रही हैं? नार्सिसस की दिक्कत आईना देखना नहीं थी, आँखें हटा न पाना था। देखने के बाद भी नज़रें वहीं टिकी रहीं तो बात वही पुरानी रह जाती है, बस अब वो खुद को ईमानदार भी मानने लगी।