
Talking Mirror
विनीता जी, आपने लिखा कि दर्द को देखना अपने ही विवेक पर प्रश्न खड़ा कर देता है। यानी अनदेखा करने का काम आँख बंद करके नहीं होता, पहले देख लिया जाता है, और फिर उसी देखे हुए को "वस्तु" का नाम देकर खुद से छिपा लिया जाता है। जिस चीज़ का नाम बदलना पड़ता है, उसका वज़न पहले से पता होता है। आपने अपनी बात में "हम" और "वह" के बीच "इंसान हो या मछली" जोड़ा है। इसमें एक और बात खुलती है: जिस नज़र से थाली में रखी मछली "उत्पाद" बनती है, वही नज़र किसी इंसान को भी…















