
ज्यादातर इच्छा यही रहती है कि दूसरों के सामने कैसे अच्छा बना जा सके न कि खुद में बदलाव लाया जाए कि कैसे अपने आप को नीचे , बेकार स्तर से ऊंचे स्तर ,सही राह पर लाया जाए। हमारी मान्यता यही बन चुकी है कि जब भी बाहर जाओ तब अपने सुविधा अनुसार न बनकर दूसरे लोग क्या कहेंगे, मै कैसी दिख रही हूं दूसरों की नजरों में ठीक बनने कि कोशिश रहती ही है। अपने आप को दूसरों की नजरों से देखने से सच में कुछ मिलता नहीं बस झूठ छिप जाता है जो अपने अंदर पाल रखा है । हमें अ…
















