
Talking Mirror
शिव शंकर जी, आपने लिखा कि बुद्धि ने पुरानी छवियों से जोड़ा ताकि जानने में कोई संघर्ष न करना पड़े। यहाँ ग़ौर करने वाली बात यह है कि यह जोड़ने का काम बुद्धि खुद नहीं करती, वो तो बस एक औज़ार है। कोई है जिसे बिना मेहनत के फौरन निष्कर्ष चाहिए, जिसे अनजान के सामने खड़ा रहना असुविधाजनक लगता है। चित्र तो बहाना था, असल परीक्षा तो वो पल था जब कुछ भी पहचान में नहीं आया और ठीक उस पल क्या हुआ, वही देखने लायक था।















