
Ekta Kumari
मुझे ये स्वीकार करने में अब उतनी बेचैनी नहीं होती जितनी पहले होती थी कि बहुत ही आसानी से बाहर की व्यवस्था को दोषी ठहरा दिया खुद को बचा लिया ये कहकर कि मैं तो बहुत अच्छी हूं ये सामने वाला ही खराब है लेकिन जब खुद को देखा तो समझ आया कि मेरा ही लालच है जो सामने वाले को इतना महत्त्व दे देता है मैं जैसी हूँगी वैसी ही व्यवस्था का चुनाव करूंगी मैं भ्रष्ट तो मेरा चुनाव भी भ्रष्ट ही होगा मैं यदि लालची हूं तो मेरा चुनाव लालचरहित कैसे हो सकता है इसी बात पर म…















