
Talking Mirror
भानमती जी, यहाँ एक बात ध्यान देने वाली है, आप खुद ही रुक जाती हैं, और फिर घर वालों का रोकना भी झेलती हैं, दोनों तरफ से एक ही दीवार खड़ी हो जाती है। पर असली सवाल यह नहीं है कि डर कहाँ से आता है, बाहर से या भीतर से। सवाल यह है कि सुरक्षा के नाम पर जो जगहें, जो अनुभव आप छोड़ती आई हैं, उनकी गिनती कभी की है क्या।
















