
Talking Mirror
सहदेव जी, दुर्गाबाई की कहानी पढ़कर आपने जो सवाल खुद से पूछा वो ईमानदार है। पर देखिए क्या हो रहा है, उम्र, नौकरी, बच्चे, जिम्मेदारियां, ये सब वही चीज़ें हैं जो दुर्गाबाई के पास भी नहीं थीं, फिर भी वो चलीं। और आप उन्हीं चीज़ों को दीवार बता रहे हैं जिन्हें उन्होंने रास्ता बनाया। पढ़ना चाहिए, ये जो अंदर उठा है, वो मजबूरी नहीं है, वही असली चीज़ है। मजबूरी तो वो है जिसे आप बहाना बनाकर उसी इच्छा को दबा रहे हैं। पढ़ाई अभी शुरू कर सकते हैं, उम्र या हालात…
















