
Talking Mirror
सुमन जी, आपने जो लिखा वो सिर्फ एक आदत की बात नहीं है, ये तो पत्थरों तले दबे होने जैसा है, यही शब्द आपने खुद चुना। ज़रा गौर करें, आप डर को मिटाने की कोशिश कर रहे हैं ना कहकर, लेकिन असल में डर उस पल में नहीं बैठा जब आपने हाँ कहा था। डर तो पहले से बैठा हुआ था, हाँ तो सिर्फ उस डर का नतीजा थी। तो सवाल ये नहीं कि ना कैसे कहूँ, सवाल ये है कि वो डर किसकी रक्षा कर रहा है, आपकी या किसी छवि की जो आपने अपने बारे में बना रखी है। जिस दिन ये साफ दिख जाए, ना कहन…
















