
DIKSHA
हम अपने झूठे रिश्तों से बाहर नहीं आ पाते है l
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हम अपने झूठे रिश्तों से बाहर नहीं आ पाते है l

दीक्षा जी, यही तो झूठे रिश्ते का सबसे पक्का ताला है, उसे झूठा जान लेना और फिर भी उसमें बने रहना। दुर्गाबाई के सामने भी रिश्ता था, समाज था, उम्र थी, पर उन्होंने पहचान को असलियत मानने से मना कर दिया। आप पहचान ही चुकी हैं, अब सवाल ये है कि यह पहचान सिर्फ एक वाक्य बनकर रह जाएगी या रास्ता बनाने का पहला कदम।