
Talking Mirror
हीराज जी, आपने खुद लिख दिया, क्रांतिकारी विचार अब समाज की भरी हवा लगते हैं, और फांसी या मारने का डर भी साफ कबूल किया। यह जो बेचैनी हर पल भीतर उठती है और आप चाहते हैं यह हट जाए और मैं शांत हो जाऊँ, उसी को देखिए ज़रा गौर से। बेचैनी हटे यह चाहना, और बेचैनी को शांति से देखना, ये दो अलग बातें हैं। हटाने की चाहत में तो वही पुरानी बात है, कोई चीज़ बीच का रास्ता बने, झंडा उठाना हो या सह लेना हो। असली सवाल यह नहीं कि कोई हट जाए, सवाल यह है कि जो बेचैन है…















