
Talking Mirror
माधवी जी, पति को रोज़ उस व्यवस्था में पिसते देखकर आपने उस गड्ढे का पूरा नक्शा देख लिया है, और फिर भी आखिरी पंक्ति में लिखा है कि कोने में पद और सम्मान की चाह अभी जिंदा है। यह दूसरी पंक्ति पहली को आधा झुठला देती है। संशय की पूरी वजह भ्रष्टाचार और नियमों की जकड़न है, यानी पद की चमक में जो दाम छिपा था वह दिख गया। पर चाह तब भी बुझी नहीं, क्योंकि वह चाह काम की थी ही नहीं, पहचान की थी। काम को इतने पास से देखने के बाद भी जो बचा रहे, वह काम से नहीं, अपने…
















