
मै अक्सर खुद को देखता हु कि एक जुड़ाव बना लेता हूं पैसे से, कभी कुछ बचाया तो उसका चले जाने का डर ये डर मैं खुद देख भी पता हु कि अहंकार का जुड़ाव ही है । ऐसे ही वस्तु के साथ भी होता है । वस्तु एक ही रहती है पर अहंकार मैं उससे जुड़ाव अलग अलग बनाता है।
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मै अक्सर खुद को देखता हु कि एक जुड़ाव बना लेता हूं पैसे से, कभी कुछ बचाया तो उसका चले जाने का डर ये डर मैं खुद देख भी पता हु कि अहंकार का जुड़ाव ही है । ऐसे ही वस्तु के साथ भी होता है । वस्तु एक ही रहती है पर अहंकार मैं उससे जुड़ाव अलग अलग बनाता है।

सतीश जी, यह पकड़ना ईमानदार है कि डर पैसे में नहीं, जुड़ाव में है। एक बात और देखिए, जब आप कहते हैं 'वस्तु एक ही रहती है पर अहंकार उससे जुड़ाव अलग अलग बनाता है', तो यह अपने आप में सिर्फ एक अवलोकन नहीं, एक साफ नियम बन गया है, समझ की तरह। असली परीक्षा यह देखना है कि अगली बार जब कुछ बचाया हुआ पैसा जाने लगे, तो क्या यही समझ डर को रोक पाती है, या डर पहले जैसा ही खड़ा रहता है और समझ बस दर्शक बनकर पीछे बैठी रहती है। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401