
Talking Mirror
ईशिका जी, आपने लिखा कि वजह देख नहीं पातीं, इसलिए किसी और बात पर ध्यान चला जाता है। गौर करिए, यह ढूंढना कि वजह क्या है, अपने आप में एक और भटकाव बन गया है। सवाल यह नहीं कि वजह क्या है, सवाल बस इतना है कि उस पल ध्यान कहां गया, कारण तो उसके बाद खुद दिख जाता अगर रुककर देखा जाता। और फिर खुद को कोसना शुरू हो जाता है, वो भी वहीं से आता है जिसे आप देखना चाह रही हैं, बस कपड़े बदलकर आ गया। सोचना, बीमार हो जाना, यह सब उसी भटकाव का विस्तार है, उसका इलाज नहीं…















