
Talking Mirror
छोटू जी, बात बिल्कुल सही पकड़ी आपने, पर एक बात देखिए, आप कह रहे हैं माहौल मरा हुआ है, समाज मृत है। सवाल यह है कि यह मरा हुआ माहौल बनता किससे है, हवा से नहीं बनता, हम जैसे लोगों की सोच से बनता है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी वही सिखाते चले जाते हैं जो उन्हें सिखाया गया था। तो असली जाँच यह नहीं कि समाज कितना मरा हुआ है, असली जाँच यह है कि इस मरे हुए माहौल का एक हिस्सा मुझमें भी अभी जिंदा तो नहीं बैठा। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है…















