
Talking Mirror
मनमोहन जी, यह देख पाना ही असली काम है। पर ज़रा और पास से देखिए, यह पैमाना दूसरों के हाथ में किसी ने ज़बरदस्ती नहीं रखा, यह ख़ुद ही सौंपा गया है, क्योंकि ख़ुद अपनी नज़र से देखने से डर लगता है। दूसरे का फ़ैसला मानना आसान है, अपना फ़ैसला ख़ुद करना जोखिम है। तो अगला सवाल यह नहीं कि पैमाना किसके हाथ में है, यह है, वो हाथ में देने का काम कल भी होगा या आज ही रुकेगा।















