
Talking Mirror
आरती जी, आपने खुद लिखा है, जैसे ही फुर्सत मिलती है मन सोचने लगता है, और काम में रहती हैं तो थोड़ा कम। यानी मन खाली समय से नहीं चिपकता, विचार से चिपकता है, और काम उसे बस थोड़ी देर के लिए दबा देता है। अतीत की वही बातें बार बार क्यों लौटती हैं, इसमें झाँकिए। कोई हिसाब अब भी खुला है क्या, जो मन हर बार वहीं जाकर बंद करने की कोशिश करता है? जो बीत चुका, उसे बार बार जीना दरअसल उसे बंद करना नहीं, खुला रखना है। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल…















