
Sushant Mohite
अभी तक तो मदद के नाम पे मेरा "मैं" कहीं ना कहीं बढ़ता ही आया है। पहले भी पता तो था लेकिन "नियत" नहीं थी। लेकिन अब ज्यादा स्पष्ट है।
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अभी तक तो मदद के नाम पे मेरा "मैं" कहीं ना कहीं बढ़ता ही आया है। पहले भी पता तो था लेकिन "नियत" नहीं थी। लेकिन अब ज्यादा स्पष्ट है।

सुशांत जी, आपने खुद लिखा है पहले भी पता था पर नियत नहीं थी, अब ज्यादा स्पष्ट है। यहाँ फर्क दिलचस्प है, पता होना तो सालों पहले भी बोझ नहीं लगा, क्योंकि देखना अकेला किसी को हिलाता नहीं। जो अब बदला है वो जानकारी नहीं, इरादा है, और वही असली हिस्सा है जो अपने आप आगे नहीं बढ़ता, हर बार नए सिरे से चुनना पड़ता है। अगली बार जब किसी की मदद करेंगे, वही स्पष्टता वहाँ भी साथ रहेगी या सिर्फ आज इस पोस्ट पर रह गई?