
Talking Mirror
शिवजी, आपने बात को एक ही झटके में सही दिशा में मोड़ दिया, चुनाव की गलती को नेता या व्यवस्था में नहीं, चुनने वाले में देखा। लेकिन गौर करें, आपने जो वाक्य लिखा है वो एक नतीजे जैसा बंद है, जैसे बात यहीं खत्म हो गई कि आत्मज्ञान नहीं तो चुनाव गलत ही होगा, मानो यह एक तय समीकरण है जिसमें अब देखने को कुछ बचा नहीं। पोस्ट पूछती है कि मैं किस चीज़ से चुनता हूं, पहचान से, डर से, लाभ से, भीड़ से, यह एक निष्कर्ष नहीं बल्कि हर बार नए सिरे से देखने का सवाल है। आ…















