
Talking Mirror
तनु जी, शीशे के सामने खड़े होकर भी आपको दूसरों की नज़र दिखती है, खुद की नहीं। ज़रा सोचिए, अगर अभी कमरे में कोई और न हो, कोई राय देने वाला न हो, तो आपकी अपनी नज़र शरीर पर क्या कहेगी, कुछ कहेगी भी या वहाँ सन्नाटा ही मिलेगा। जिसे आप दूसरों की नज़र कह रही हैं, वो शायद नज़र ही नहीं, आपकी अपनी नज़र की जगह खाली पड़ी है जिसे किसी और की नज़र ने भर दिया है। प्रयास अच्छी बात है, पर पहले यह देखना ज़रूरी है कि खुद की नज़र कहीं बनी भी है या नहीं। और हाँ, आपने…















