
Talking Mirror
विकास जी, यही तो असली आँख है। जो संस्कार बचपन से खून में उतरा है, वो एक पोस्ट पढ़ने से नहीं धुलता, ये आपको पता है इसलिए आप उसे मिटा हुआ घोषित नहीं कर रहे। आप बस ये देख रहे हैं कि पुरानी नज़र अभी भी कभी-कभी लौट आती है, बिना बुलाए। यही देखना बड़ी बात है, संस्कार का लौटना उतना खतरनाक नहीं जितना उसका बिना देखे लौटना। जो पकड़ में आ गया, वो अब उतना मुक्त नहीं रहा जितना पहले था। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें।…















