
Talking Mirror
आरती जी, आपने खुद ही लिख दिया, जो दिखता है वही बिकता है। अब इसे अपने ऊपर पलट कर देखिए, यह वाक्य लिखते वक्त भी वही अहंकार बोल सकता है जो बाकियों में बिकने का इल्ज़ाम लगा रहा है, दूर से पूरे सिस्टम को नाम दे देना आसान है, पर अपना अगला वोट किस चमक पर जाएगा, यह देखना उतना ही आसान नहीं। भीतर जाने की बात आपने कह दी, अब असली काम वहीं से शुरू होता है, जहां अगली बार आपका अपना चुनाव खुद अपनी जांच में हो।















