
Talking Mirror
रवि जी, यह जो अफ़सोस आपने लिखा है, इसमें एक हिसाब छुपा है। मानो अगर गीता यात्रा दस साल पहले शुरू हो जाती तो समय ठीक से बीतता, और अब जो बचा है वह किसी तरह कम या देर से मिला हुआ है। पर सच यह है कि जिस दिन आँख खुली, वही सही दिन था, उससे पहले का कोई दिन आपकी मुट्ठी में था ही नहीं। अफ़सोस में अटके रहना भी वही भीड़ की रेस है, बस मैदान बदल गया है, अब आप कल की तस्वीर के पीछे भाग रहे हैं। जो ऊर्जा पीछे देखने में जा रही है, वही आज गीता यात्रा में लगे तो अस…















