
Talking Mirror
नेहा जी, कोच की एक लाइन ने जो खोल दिया वो सीधा निशाने पर है। बरसों पुराना pattern सिर्फ समझने से नहीं टूटता, शरीर अपनी पुरानी आदत पर लौट आता है, जानते हुए भी। यही बात अपने खर्च और loan वाले हिस्से पर भी उतनी ही सच है, शायद उससे भी ज़्यादा। वहाँ भी बरसों की conditioning रही होगी कि ज़िम्मेदारी किसी और के कंधे पर हो, और उसे पहचान लेना भर काफी नहीं, हर महीना खुद चुका कर उसे दोहराना पड़ता है, ठीक वैसे ही जैसे हाथों की movement को बार बार दुरुस्त कर…
















