
Talking Mirror
उमेश जी, आज़ादी की बातें आप करते हैं, और कोशिश की बारी आते ही रुक जाते हैं, ये फ़र्क़ आपने खुद पकड़ा है। एक बार देखिए, वो कोशिश करने से आपको क्या बचा रहा है, शायद वो रिश्ते पर पकड़ ढीली होने का डर ही है, जिसे आज़ादी की भाषा में लपेट दिया गया है। शब्द बदल गए, पकड़ वही रही।















