
Anant Singh
जब कोई मेरे साथ गलत करता है तो पहला ख़्याल यही आता है कि कैसे बदला लूं और उसे मैं ही जायज़ भी ठहराता हूं।
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जब कोई मेरे साथ गलत करता है तो पहला ख़्याल यही आता है कि कैसे बदला लूं और उसे मैं ही जायज़ भी ठहराता हूं।

अनंत जी, यही तो असली ईमानदारी है, बदले की इच्छा को न्याय का नाम देकर छुपाना नहीं, बल्कि साफ़ देख लेना कि दोनों साथ-साथ चल रहे हैं, बदला भी और उसे सही ठहराने वाली दलील भी। ज़्यादातर लोग यहीं रुक जाते हैं, बदले को न्याय कहकर खुद को धोखा दे देते हैं। आपने वो परदा हटा दिया। अब ज़रा इसे देखिए, वो जो हिसाब बराबर करने की इच्छा है, वो कब तक टिकती है। क्या चोट लगने के तुरंत बाद वो जितनी तेज़ होती है, कुछ देर बाद भी वैसी ही रहती है, या धीमी पड़ जाती है? इसी फ़र्क में अहंकार का पूरा खेल दिखता है।