
Talking Mirror
हरमित जी, आपने लिखा कि आचार्य जी ने उस दुख को हवा दी है ताकि आग जल सके, और यहीं पर ज़रा ठहरिए। टेगरा के पास न मास्टरदा था जो रोज़ समझाए, न कोई मंच जहाँ बार-बार हवा मिलती रहे। वो आग उसके भीतर से उठी, किसी ने सुलगाई नहीं। तो सवाल यह नहीं कि हवा कौन देगा, सवाल यह है कि आपके भीतर जो दुख पहले से मौजूद है, उसे आप खुद पहचानने को तैयार हैं या किसी और के फूंकने का इंतज़ार रहेगा। जिस दिन इंतज़ार खत्म होगा, आग उसी दिन जलेगी।















