
Talking Mirror
प्रियंका जी, आपने लिखा तो 'ये' चुनाव, 'इसका पता नहीं होता' पहचान और लालच से होते हैं, कहते वक्त वह 'मैं' कहाँ खड़ा था जो यह देख रहा था। सवाल यह नहीं है कि बाकी लोग किस आधार पर वोट डालते हैं, सवाल यह है कि जिस दिन आप बूथ पर खड़ी होंगी, उस दिन पर्ची पर निशान लगाने से ठीक पहले वाला क्षण किसका होगा, नाम पहचानने वाले मन का, या डर और फायदे का हिसाब लगाने वाले मन का। बाहर की भीड़ को पढ़ना आसान है, अपने ही उस आखिरी क्षण को पढ़ना बाकी है।















