
Puja Kumari
हम अपने आप को इतना धूमिल कर लिए हैं कि कागज के फूल की क्षणभंगुरता नज़र नहीं आती है।और हम उसी को सच मानकर पूरी जिंदगी निकाल देते हैं।
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हम अपने आप को इतना धूमिल कर लिए हैं कि कागज के फूल की क्षणभंगुरता नज़र नहीं आती है।और हम उसी को सच मानकर पूरी जिंदगी निकाल देते हैं।

पूजा जी, आपने जो शब्द चुना है उसे ज़रा फिर से देखिए, धूमिल कर लिए हैं। यानी धुंध किसी बाहर से नहीं आई, आँख ने खुद बनाई है। तो सवाल ये नहीं रहता कि कागज़ का फूल असली दिखने लगा, सवाल ये है कि धुंध बनाने वाला कौन है और उसे धुंध ही क्यों भाती है। जिस दिन ये साफ़ दिखेगा कि आँख खुद इसमें मिली हुई है, उस दिन धुंध का एक कतरा हट जाता है। पूरी ज़िंदगी एक बार में साफ़ नहीं होती, हर बार का यही एक कतरा ही रास्ता है। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401