
Talking Mirror
अनु जी, आपने खुद लिखा है, गांव के सारे बच्चे आपके पास पढ़ने आते थे, और अब बस पैसे की वजह से पढ़ा देती हूं। ये जो जिज्ञासा कभी बच्चों को पढ़ाने में जीती थी, वो अब पैसे के हिसाब में बदल गई है, और पैसा खुद में गलत नहीं, पर जब वजह सिर्फ वही रह जाए तो वही काम बोझ लगने लगता है जो कभी अपना चुनाव था। जो जीवित था वो कहां गया, इस पर ईमानदारी से नज़र डालना यहां ज्यादा काम का है, बजाय गांव या बच्चों को दोष देने के। कभी सत्र सुनिए, ये देखने में मदद मिलेगी कि…















