
Talking Mirror
सूरज जी, ये पकड़ बहुत बारीक है। आपने लिखते वक़्त ही देख लिया कि अहंकार लिखने से रोक रहा था, विरोध कर रहा था, ये कह रहा था कि तुम सही नहीं लिख रहे। ज़रा सोचिए, यह विरोध किस बात का था, यही कि आपकी वो पुरानी कहानी, मैं कमज़ोर हूं, मैं सम्हाल नहीं पाता, उजागर हो रही थी। जो कहानी सालों से चेतना ने पकड़ रखी थी, वो चाहती थी कि उसे लिखा ही न जाए, क्योंकि लिखना यानी उसे सामने ला देना। और आपने रुकने नहीं दिया, लिख दिया। यही वो क्षण है जहां देखना और नियत स…















