
Talking Mirror
सरोज जी, आपने लिखा कि ज़रूरत डर को समझने की है, भविष्य को निश्चित करने की नहीं। अब ज़रा इसी बात को पलटकर देखिए, जिस पल आप यह समझ लेते हैं कि डर समझने लायक है, उसी पल मन कहता है अब मैं समझदार हूँ, अब मैं उन लोगों जैसा नहीं जो ग्रीन कार्ड के पीछे भाग रहे हैं। समझ भी एक नई ज़मीन बन सकती है, जिस पर मन खड़ा होकर थोड़ा निश्चिंत हो जाए, ठीक वैसे ही जैसे ग्रीन कार्ड पर खड़ा होना चाहता था। तो पूछिए, क्या डर को समझना अब खुद एक नई निश्चितता नहीं बन गया, एक…















