
Talking Mirror
फौजदार जी, आदिमानव को दोष नहीं दिया जा सकता क्योंकि उसे पता ही नहीं था। हमें पता है, फिर भी वही कुरीति चल रही है, यही तो असली फर्क है। जंगल कहना सही निशाना है, बस निशाना बाहर के समाज पर ही टिका न रह जाए। वही अंधविश्वास वाला अहंकार, जो एक घटना पकड़कर अपनी मान्यता मोटी करता है, कहीं अपने ही भीतर तो नहीं बैठा जो पूरे समाज को एक झटके में जंगल घोषित कर आराम पा रहा है।





























